वैसे तो मेरा परिचय कुछ भी नहीं है मेरे नाम के सिवा ....., परन्तु अक्सर मेरा नाम भी सामने वाले को चक्कर में डाल देता है कि आखिर मैं हूँ कौन ? किस जाति, किस प्रदेश से सम्बन्ध रखती हूँ ? मेरा नाम जान कर कोई मुझे दक्षिण भारतीय समझना चाहे इससे पहले ही मेरी भाषा और मेरा रंग उसके विरोध में अपना मत दे देता है . तब कोई मुझे बंगाली , मराठी या कुछ और समझता है .. कुल मिला कर मैं भारतीय एकता की मिसाल बन जाती हूँ ....पर अंत तक कोई ये नहीं समझ पाता कि मैं राजस्थान की एक दुर्लभ ऐतिहासिक जाति से सम्बन्ध रखती हूँ ..राजस्थान के जैसलमेर के शाही घराने के राव थे मेरे नानाजी . अब राव शब्द से तात्पर्य है सरल शब्दों में " भाट" ..
भाटो में भी कई उपजातियां होती है ,मसलन -मांग कर खाने वाले भाट, खाना बदोश भाट तथा सामान्य हिन्दू जातियों के भाट तथा जमींदार वर्ग . .ये जाति अन्य पिछड़ा वर्ग में घोषित कि गई है, मगर मज़े की बात ये है कि जो भाट अनुसूचित जाति के भाट होते है वो स्वयं भी अनुसूचित जाति में स्वयं को दर्ज करवाने में शर्म नहीं महसूस करते हैं , और जो जमींदार वर्ग या सामान्य वर्ग के भाट होते है वो स्वयं को सवर्ण घोषित करते हैं . आम हिन्दू जातियों के भाट अपने यजमान के पूरे ख़ानदान का वंशावली का ब्यौरा अपने पास रखते है जिनकी अपनी एक लिपि होती है .जब भी इनके यजमानो के यहाँ कोई उत्सव होता है तो इन भाटो को मनुहार पूर्वक बुलाया जाता है , तथा विरदावली बंचवाई जाती है . और यथा संभव दक्षिणा देकर उन्हें विदा किया जाता है .एक भाट की विरदावली यह साबित करती है कि उसके यजमान की सात पीढियां दोष रहित है या दोष सहित हैं .और वर - कन्या के विवाह में यह अहम् होता है . ताकि एक निर्दोष कुल में रिश्ता किया जा सके .कई बार जायदाद के बंटवारे से सम्बन्धत विवाद में कोर्ट को भी भाटो की शरण लेनी पड़ती है ताकि जायदाद के असली मालिक की पहचान हो सके . इसके लिए उसकी विरदावली या बही के लेख को सबूत के तौर पर पेश भी किया जाता है.क्योकि ये पीढ़ी दर पीढ़ी चली रही होती है.. परन्तु अब ये विलुप्त होने के कगार पर है. दूर दराज के गाँव ढाणियों के अलावा ये प्रथा अब देखने को नहीं मिलती...हाँ !! गाँव में आज भी भाटो का सम्मान होता है..
मुझे याद है मेरे नानाजी की बही या बिरदावाली .. जिसे वो बहुत सहेज कर रखते थे . उस गुप्त लिपि को उनके ख़ानदान के लड़के ही समझ सकते थे , और वैसे भी वो किसी और की समझ से बाहर की चीज़ थी .कभी सोना चाँदी, रत्नाभूषण ,कभी हाथी- घोड़े तो कभी बहुमूल्य वस्त्रादि के बेशकीमती तोहफे उन्हें भेंट किये जाते थे . पर धीरे धीरे सब ख़त्म हो गया .. नानाजी भी नहीं रहे और वो हाथी घोड़े भी .. रहे मेरे ६ मामाजी तो उन्होंने इस काम की बजाय अपने अपने बिज़नस या डिफेंस में नौकरी को ज्यादा तजरीह दी .
.........और अब मुझे वो हाथी घोड़े के निशान वाली लाल बही कहती है..... राजा -महाराजाओ ने तुम्हे "राव " के जिस ख़िताब से नवाज़ा, उसे तुम धीरे धीरे खो चुकी हो ...... तुम्हारी पहचान आज कुछ नहीं है ...आज न राजा महाराजा है ,ना रजवाड़े हैं .और ना ही रावों की पहचान ही स्पष्ट है .सब कु छ धुंधला है .
भाटो में भी कई उपजातियां होती है ,मसलन -मांग कर खाने वाले भाट, खाना बदोश भाट तथा सामान्य हिन्दू जातियों के भाट तथा जमींदार वर्ग . .ये जाति अन्य पिछड़ा वर्ग में घोषित कि गई है, मगर मज़े की बात ये है कि जो भाट अनुसूचित जाति के भाट होते है वो स्वयं भी अनुसूचित जाति में स्वयं को दर्ज करवाने में शर्म नहीं महसूस करते हैं , और जो जमींदार वर्ग या सामान्य वर्ग के भाट होते है वो स्वयं को सवर्ण घोषित करते हैं . आम हिन्दू जातियों के भाट अपने यजमान के पूरे ख़ानदान का वंशावली का ब्यौरा अपने पास रखते है जिनकी अपनी एक लिपि होती है .जब भी इनके यजमानो के यहाँ कोई उत्सव होता है तो इन भाटो को मनुहार पूर्वक बुलाया जाता है , तथा विरदावली बंचवाई जाती है . और यथा संभव दक्षिणा देकर उन्हें विदा किया जाता है .एक भाट की विरदावली यह साबित करती है कि उसके यजमान की सात पीढियां दोष रहित है या दोष सहित हैं .और वर - कन्या के विवाह में यह अहम् होता है . ताकि एक निर्दोष कुल में रिश्ता किया जा सके .कई बार जायदाद के बंटवारे से सम्बन्धत विवाद में कोर्ट को भी भाटो की शरण लेनी पड़ती है ताकि जायदाद के असली मालिक की पहचान हो सके . इसके लिए उसकी विरदावली या बही के लेख को सबूत के तौर पर पेश भी किया जाता है.क्योकि ये पीढ़ी दर पीढ़ी चली रही होती है.. परन्तु अब ये विलुप्त होने के कगार पर है. दूर दराज के गाँव ढाणियों के अलावा ये प्रथा अब देखने को नहीं मिलती...हाँ !! गाँव में आज भी भाटो का सम्मान होता है..
मुझे याद है मेरे नानाजी की बही या बिरदावाली .. जिसे वो बहुत सहेज कर रखते थे . उस गुप्त लिपि को उनके ख़ानदान के लड़के ही समझ सकते थे , और वैसे भी वो किसी और की समझ से बाहर की चीज़ थी .कभी सोना चाँदी, रत्नाभूषण ,कभी हाथी- घोड़े तो कभी बहुमूल्य वस्त्रादि के बेशकीमती तोहफे उन्हें भेंट किये जाते थे . पर धीरे धीरे सब ख़त्म हो गया .. नानाजी भी नहीं रहे और वो हाथी घोड़े भी .. रहे मेरे ६ मामाजी तो उन्होंने इस काम की बजाय अपने अपने बिज़नस या डिफेंस में नौकरी को ज्यादा तजरीह दी .
.........और अब मुझे वो हाथी घोड़े के निशान वाली लाल बही कहती है..... राजा -महाराजाओ ने तुम्हे "राव " के जिस ख़िताब से नवाज़ा, उसे तुम धीरे धीरे खो चुकी हो ...... तुम्हारी पहचान आज कुछ नहीं है ...आज न राजा महाराजा है ,ना रजवाड़े हैं .और ना ही रावों की पहचान ही स्पष्ट है .सब कु छ धुंधला है .
u r rigth nimmy ji
जवाब देंहटाएंबिल्कुल सही बात हैं !
जवाब देंहटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंहम भाट है पर इतिहास अधुरा जानते है
जवाब देंहटाएंहम महाराष्ट्र मे पिडियो से रहते आये है
मुज़े कुछ जानकारि चाहिए
आप हमारि कुछ् मदत करोगे क्या जि
गजानन वि लाडकर from Nagpur
Mo no 9665237999
हम इन्दौर मप्र से है । यहां ब्रम्हभट्ट (भाट ) क्षत्रिय लिखते है और ये जानकारी है कि चित्तौड के बागोर गाँव से निकले है जो भी इस बारे में कुछ जानता हो कृपया बताये ।
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